'पीताम्बरा' नाम का अर्थ

'पीताम्बरा' दो शब्दों से बना है — 'पीत' अर्थात पीला और 'अम्बर' अर्थात वस्त्र। अर्थात वह देवी जो पीले वस्त्र धारण करती हैं। ध्यान श्लोकों में माँ बगलामुखी को पीत वर्ण वाली, पीले वस्त्र और पीली माला धारण किए हुए, पीत पुष्पों से पूजित बताया गया है। इसलिए उनके भक्त उन्हें प्रेम से 'पीताम्बरा माँ' कहते हैं।

परंपरा में एक कथा प्रचलित है कि सत्य युग में एक भीषण तूफ़ान से सृष्टि संकट में पड़ गई। तब भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र क्षेत्र में हरिद्रा (हल्दी) सरोवर के तट पर तप किया और उस सरोवर से पीत वर्ण वाली माँ बगलामुखी प्रकट हुईं, जिन्होंने तूफ़ान को स्तंभित कर दिया। इसी कथा के कारण हल्दी और पीला रंग माँ की पूजा से जुड़ गए।

पीला रंग किसका प्रतीक है

  • स्थिरता — पृथ्वी तत्व और स्तंभन शक्ति से संबंध
  • ज्ञान और विवेक — गुरु (बृहस्पति) ग्रह का रंग
  • शुद्धता और मंगल — हल्दी को शुभ कार्यों में प्रथम स्थान
  • तेज और आत्मविश्वास — सूर्य के प्रकाश जैसा प्रभाव

ज्योतिष में पीला रंग गुरु ग्रह से जुड़ा है और गुरुवार को माँ बगलामुखी की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। यही कारण है कि अनेक श्रद्धालु गुरुवार को पीले वस्त्र पहनकर मंदिर में दर्शन करने आते हैं। रंग का यह प्रयोग मन को एकाग्र करता है और साधक को बार-बार यह स्मरण दिलाता है कि वह किस देवी की उपासना कर रहा है।

पूजा में पीली सामग्री और उसका उपयोग

पीले वस्त्र

पूजा या जाप के समय साधक स्वयं पीले या केसरिया वस्त्र पहनता है और पीला आसन बिछाता है। वस्त्र स्वच्छ, सादे और सूती हों तो उत्तम है। माँ को अर्पित करने के लिए पीली चुनरी भी ले जाई जा सकती है।

हल्दी की माला

माँ बगलामुखी के मंत्र जाप के लिए परंपरागत रूप से हल्दी की गाँठों से बनी माला का प्रयोग होता है। माला को प्रयोग से पहले शुद्ध करके, गुरु या आचार्य से अभिमंत्रित करवाना उचित माना जाता है। जाप की विधि और संख्या के लिए हमारा लेख 'बगलामुखी मूल मंत्र जाप विधि' देखें।

पीले पुष्प और भोग

गेंदा, कनेर और अन्य पीले पुष्प माँ को प्रिय माने जाते हैं। भोग में बेसन के लड्डू, चने की दाल, केसरिया चावल या पीली मिठाई अर्पित करने की परंपरा है। हवन में भी हल्दी और पीली सरसों जैसी सामग्री का विशेष स्थान है — पूरी सूची के लिए 'हवन सामग्री सूची' वाला लेख पढ़ें।

घर पर पूजा करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

  1. पूजा स्थान को स्वच्छ करके पीला कपड़ा बिछाएँ
  2. माँ के चित्र या यंत्र के सामने घी का दीपक जलाएँ
  3. हल्दी से तिलक करें और पीले पुष्प अर्पित करें
  4. सरल प्रार्थना या स्तोत्र का पाठ करें; जटिल मंत्र प्रयोग आचार्य के मार्गदर्शन में ही करें
  5. पीला भोग अर्पित करके परिवार में प्रसाद बाँटें

यदि आप माँ बगलामुखी की आरती या स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहते हैं, तो 'बगलामुखी आरती एवं स्तोत्र' लेख में दिए गए पाठ और नियम सहायक होंगे।

आम गलतफहमियाँ

कई लोग मानते हैं कि केवल पीला पहन लेने से ही फल मिल जाता है। वास्तव में रंग एक सहायक प्रतीक है; मूल तत्व श्रद्धा, शुद्ध संकल्प और नियमित साधना है। इसी प्रकार हल्दी माला को ताबीज़ की तरह बिना विधि पहनना भी उचित नहीं माना जाता। रक्षा के लिए धारण की जाने वाली वस्तुओं के बारे में जानने के लिए 'बगलामुखी कवच धारण विधि' पढ़ें।

एक और भ्रम यह है कि पीले रंग का प्रयोग केवल शत्रु बाधा के लिए होता है। वास्तव में यह ज्ञान, शुभता और गृहस्थ जीवन की समृद्धि का भी प्रतीक है, इसलिए परिवार की सामान्य मंगल-कामना की पूजा में भी इसका प्रयोग उतना ही उचित है।

पर्व-त्योहारों पर पीताम्बरा पूजा

बगलामुखी जयंती, नवरात्रि और बसंत पंचमी जैसे अवसरों पर पीले रंग का महत्व और बढ़ जाता है। बगलामुखी जयंती पर नालखेड़ा में माँ का विशेष पीत श्रृंगार किया जाता है और श्रद्धालु पीले वस्त्र पहनकर दर्शन करते हैं। नवरात्रि में अष्टमी के दिन पीले पुष्पों से अर्चना और हल्दी की आहुति के साथ हवन करना शुभ माना जाता है। इन दिनों के महत्व को विस्तार से जानने के लिए 'बगलामुखी जयंती का महत्व' लेख पढ़ें।

यदि आप इन पर्वों पर स्वयं नालखेड़ा नहीं आ सकते, तो आपके नाम और गोत्र से संकल्प लेकर मंदिर में पीत सामग्री से विधिवत पूजा करवाई जा सकती है। इससे दूर रहने वाले श्रद्धालु भी इस परंपरा से जुड़े रह सकते हैं और माँ का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

पीला रंग माँ की याद दिलाता है; फल श्रद्धा से मिलता है।